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विसनोई धर्म के स्वतंत्र अस्तित्व का पुख्ता प्रमाण

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साहबरामजी राहड़ कृत जंभसार के 19वें प्रकरण में वर्णित है कि गुरु जांभोजी औरैया से चलकर मुसाणपुर गाँव पहुँचे। वहाँ उनके दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग आने लगे। उस स्थान पर प्रतिदिन सवा मण घी का होम होता था तथा अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती थी। लोग श्रद्धापूर्वक खांड, खोपरा, मिश्री, विभिन्न प्रकार की सुगंधित मिठाइयाँ, तिल, जौ, गिरी, छुहारे, किशमिश, अनाज, घी आदि भेंट स्वरूप लाने लगे। साधुजन निरंतर होम कर रहे थे और सबदों की ध्वनि से आकाश गुंजायमान हो रहा था। गाँव-गाँव से जमातें आने लगीं। दिन-रात दर्शनार्थियों का ताँता लगा रहता था। मुसाणपुर के निकट कन्नौज नाम का एक नगर था, जहाँ खड़गसिंह नाम का राजा राज्य करता था। एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने एक ऋषि को तपस्या करते हुए देखा। ऋषि के आश्रम को देखकर राजा वहाँ पहुँचा। ऋषि ध्यानमग्न होकर बैठे थे। राजा ने मन में विचार किया कि ऋषि ने उसे देखकर ही ध्यान लगाने का ढोंग किया है। इसी अहंकारवश उसने पास में पड़ा गोबर उठाकर ऋषि के सिर पर दे मारा। कुछ देर रुककर उसने दोबारा गोबर मारा। इस प्रकार राजा ने कई बार ऋषि के सिर पर गोबर फेंका और फिर वहाँ से चला गया। कुछ समय बाद ऋषि का एक शिष्य वहाँ पहुँचा। अपने गुरु की ऐसी अवस्था देखकर वह अत्यंत क्रोधित हो उठा। क्रोध में भरकर उसने श्राप दे दिया कि जिसने भी उसके गुरु की यह दुर्दशा की है, उसे इसी समय कुष्ठ रोग हो जाए। श्राप देकर वह विलाप करने लगा। तब ऋषि ने अपनी आँखें खोलीं और शिष्य को शांत कराया। इसके बाद उन्होंने उसे पूरी घटना बताई। उधर राजा खड़गसिंह अपने महल पहुँचा और कपड़े बदलने लगा। तभी उसने देखा कि उसके शरीर पर कुष्ठ रोग के लक्षण प्रकट हो चुके हैं। यह देखकर वह भयभीत हो गया और तुरंत वापस ऋषि के आश्रम पहुँचा। वहाँ जाकर उसने ऋषि के चरणों में सिर झुकाया और श्राप से मुक्ति देने की प्रार्थना की।ऋषि ने कहा कि अब श्राप वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन उन्होंने कुष्ठ रोग से मुक्ति का एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि संसार में हिंदू और मुसलमान दो पंथ प्रचलित हैं। इन दोनों से भिन्न किसी तीसरे पंथ को मानने वाले व्यक्ति के दर्शन करने मात्र से उसका कुष्ठ रोग दूर हो सकता है। यह सुनकर राजा खड़गसिंह उस तीसरे पंथ के अनुयायी व्यक्ति की तलाश में निकल पड़ा। वह प्रतिदिन इधर-उधर घूमकर लोगों से पूछताछ करने लगा। तीन वर्षों तक उसने अनेक स्थानों पर खोज की, लेकिन उसे तीसरे पंथ का कोई अनुयायी नहीं मिला। जहाँ भी वह जाता, वहाँ या तो हिंदू मिलते या मुसलमान। लोग कहते कि उन्होंने आज तक किसी तीसरे पंथ के बारे में सुना ही नहीं है। एक दिन गुरु जांभोजी की जमात उस क्षेत्र में पहुँची। राजा खड़गसिंह के एक दूत ने जमात के लोगों से पूछा— “आप किस पंथ के अनुयायी हैं और कहाँ निवास करते हैं?” इस पर एक विसनोई ने उत्तर दिया— “हम विसनोई पंथ के अनुयायी हैं।” यह सुनकर दूत ने कहा कि आप सभी तो देखने में हिंदुओं जैसे लगते हैं। विसनोई नाम के किसी पंथ के बारे में तो उसने कभी सुना ही नहीं था। यह कोई नया पंथ प्रतीत होता है। उस विसनोई ने उत्तर दिया कि आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? हम हिंदू नहीं, बल्कि विसनोई हैं। दूत ने विचार किया कि यदि ये हिंदू नहीं हैं तो अवश्य ही मुसलमान होंगे। इसलिए उसने फिर पूछा— “आप मुसलमान हैं क्या? आप पोथी पढ़ते हैं या कुरान?” इस पर विसनोई ने स्पष्ट किया— “हम मुसलमान भी नहीं हैं। हमें पूर्ण सतगुरु मिल गए हैं, इसलिए हमने हिंदू और मुसलमान दोनों पंथों को छोड़ दिया है। हम विसनोई पंथ के अनुयायी हैं।” यह सुनकर दूत तुरंत राजा खड़गसिंह के पास पहुँचा और उत्साहपूर्वक बोला कि हिंदू और मुसलमान दोनों से भिन्न पंथ को मानने वाले अनेक पुरुष आए हैं। वह स्वयं उनसे मिलकर आया है। राजा को उसके साथ चलकर उनके दर्शन करने चाहिए। यह समाचार सुनते ही राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने भेंट सामग्री तैयार करवाई और भेंट का थाल लेकर नंगे पैर ही दर्शन करने के लिए दौड़ पड़ा। राजा खड़गसिंह विसनोई जमात के पास पहुँचा तो उन्हें देखकर अत्यंत हर्षित हुआ। उसने उनकी परिक्रमा की और श्रद्धापूर्वक भेंट अर्पित की। उनके चरणों की रज अपने मस्तक पर लगाई। इसके बाद उनके चरण धोकर चरणोदक ग्रहण किया। उसने ऋषि द्वारा बताए गए उपाय के अनुसार सभी क्रियाएँ संपन्न कीं। ऐसा करने के पश्चात जब राजा ने अपने शरीर को देखा तो उसका कुष्ठ रोग पूरी तरह समाप्त हो चुका था। उसका शरीर कंचन के समान निर्मल हो गया। यह चमत्कार देखकर राजा ने हाथ जोड़कर कहा— “धन्य हैं आप और धन्य है आपकी जमात! आपके दर्शन मात्र से मेरा कुष्ठ रोग दूर हो गया। आप तो सभी संतों में श्रेष्ठ हैं।” इसके बाद राजा खड़गसिंह विसनोई जमात को अपने महल में ले गया। उसने उन्हें एक शुभ स्थान पर आसन ग्रहण करवाया और अपनी इच्छानुसार उत्तम भोजन करवाया। उसने पूरी जमात की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की। तब विसनोई जमात के लोगों ने राजा से कहा कि हमारे गुरुदेव गुरु जांभोजी हैं। आप उनके पास जाकर उनकी सेवा और दर्शन कीजिए। यह सुनकर राजा के मन में गुरु जांभोजी के प्रति गहरी श्रद्धा और जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उसने विसनोई जमात को विदा किया और उसी दिन से गुरु जांभोजी के दर्शन करने के लिए व्याकुल रहने लगा। एक दिन राजा खड़गसिंह को समाचार मिला कि गुरु जांभोजी मुसाणपुर में विराजमान हैं। यह सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने सौ अशर्फियाँ, पताशे आदि भेंट सामग्री से एक थाल सजवाया। साथ ही सौ घोड़ों और पच्चीस रथों का दल तैयार करवाया और गुरु जांभोजी के दर्शन करने के लिए मुसाणपुर की ओर प्रस्थान किया। मुसाणपुर पहुँचकर राजा ने गुरु जांभोजी के समक्ष भेंट अर्पित की और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगा। राजा की श्रद्धा देखकर गुरु जांभोजी प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद गुरु जांभोजी ने राजा से कहा कि जो भेंट सामग्री वह लेकर आया है, उससे यहाँ एक मंदिर का निर्माण करवाए। इस मंदिर में मेला लगा करेगा। जो भी श्रद्धापूर्वक इसके दर्शन करेगा, उसे रोगों से मुक्ति मिलेगी। अंधे को आँखें, कुष्ठ रोगी को स्वस्थ काया तथा निःसंतान स्त्री को संतान की प्राप्ति होगी।

गुरु जांभोजी के वचन सुनकर राजा खड़गसिंह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने उसी स्थान पर मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ करवा दिया। गुरु जांभोजी के हाथों से मंदिर की नींव रखवाई गई और शीघ्र ही वहाँ एक सुंदर मंदिर का निर्माण हुआ। इस स्थान पर छत्तीसों जातियों के लोग आकर पूजा-अर्चना करते हैं। गुरु जांभोजी उनके दुःख और दरिद्रता का नाश करते हैं। यहाँ वर्तमान समय तक मेला लगता आया है। इस प्रकार गुरु जांभोजी मुसाणपुर में कई दिनों तक विराजमान रहे। इसके पश्चात वे मुसाणपुर से प्रस्थान कर यमुना नदी के घाट स्थित कालपी पहुँचे।

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Sanjeev Moga
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