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ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर—लेकिन समाजहित में सवाल जरूर उठेंगे।
सादर निवण प्रणाम जी,
542वाँ बिश्नोई धर्म स्थापना दिवस हमारे लिए सामान्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि दीपावली जैसे पवित्र उत्सव का दिन है। गुरु जम्भेश्वर भगवान ने 29 नियम, शब्दवाणी, जीव रक्षा, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति, सदाचार और मानव कल्याण का जो मार्ग दिखाया, वह आज और भी अधिक प्रासंगिक है।
लेकिन फतेहाबाद जैसे बिश्नोई समाज के मजबूत क्षेत्र में इतने महत्वपूर्ण आयोजन में समाज की अपेक्षा के अनुरूप कम हाजिरी निश्चित रूप से आत्ममंथन का विषय है। इसे केवल भीड़ का आंकड़ा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कहीं न कहीं यह समाज और नेतृत्व के बीच संवाद की कमी का संकेत भी हो सकता है।
बिश्नोई सभा फतेहाबाद, सेवक दल तथा आयोजन से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं ने व्यवस्थाओं के लिए मेहनत की, यह सराहनीय है। नई पीढ़ी के शुभम जी काकड़ ने मंच संचालन में आत्मविश्वास दिखाया—ऐसी प्रतिभाओं को लगातार अवसर मिलना चाहिए।
कार्यक्रम में मंत्री श्री कृष्ण बेदी जी, श्री कुलदीप जी बिश्नोई, श्रीमती सुमन सुभाष जी खीचड़(जिला प्रमुख, फतेहाबाद), श्री रणधीर जी पनिहार(विधायक नलवा), श्री दुड़ाराम जी, श्री प्रवीण जोड़ा जी सहित समाज के जनप्रतिनिधियों और विभिन्न जिलों से आए पदाधिकारियों का स्वागत भी सराहनीय रहा। सिविल हॉस्पिटल का नाम चौधरी भजनलाल जी के नाम पर करने तथा मंदिर के लिए शेड जैसी घोषणाएँ भी स्वागत योग्य हैं।
लेकिन सवाल यह है कि 542वें स्थापना दिवस के धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष को क्या उतनी ही प्राथमिकता मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी?
जब स्वामी डॉ. सच्चिदानंद जी लालासर साथरी जैसे संत उपस्थित हों, तो समाज उनकी वाणी सुने, गुरु जम्भेश्वर भगवान के जीवन, स्थापना दिवस के इतिहास और 29 नियमों पर मार्गदर्शन प्राप्त करे—यह अवसर बार-बार नहीं मिलता। उनको बोलने का अवसर देना चाहिए था।
राजनीति समाज का हिस्सा हो सकती है, लेकिन धार्मिक मंच की अपनी गरिमा और प्राथमिकता होती है। राजनीतिक गतिविधियाँ अपने स्थान पर रहें और स्थापना दिवस पर धर्म, संस्कार, जीव रक्षा, पर्यावरण, नशामुक्ति और गुरु जम्भेश्वर भगवान के संदेश को केंद्र में रखा जाए।
एक और बात—सम्मान में समानता कहाँ है?
समाज की पहली और एकमात्र महिला जिला प्रमुख श्रीमती सुमन सुभाष जी खीचड़ का नाम मुख्य उद्घाटन पटल में न होना भी समाज में चर्चा और सवाल का विषय बना है। पहले पम्पलेट में नाम नहीं था, विरोध के बाद अलग पम्पलेट में नाम दिया गया और अब चौधरी भजनलाल जी के प्रतिमा अनावरण मुख्य उद्धघाटन पटल में फिर नाम नहीं दिखाई देना स्वाभाविक रूप से लोगों को सोचने पर मजबूर करता है।
यह किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष का सवाल नहीं है।
यदि हम सच में एक हैं तो सम्मान भी एक जैसा होना चाहिए।
पद छोटा-बड़ा हो सकता है, लेकिन सम्मान छोटा-बड़ा नहीं होना चाहिए। जो लोग स्वयं को समाज का सर्वेसर्वा समझने लगते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि समाज किसी व्यक्ति की जागीर नहीं—समाज सबका है।
“दूर से दोस्ती का दावा तो बहुत करते हैं लोग,
दिल से जो मिल जाएँ, वही अपने कहलाते हैं।”
आज आवश्यकता आरोप लगाने की नहीं, अपने भीतर झाँकने की है।
कम होती हाजिरी हमें बता रही है कि समाज को केवल बड़े मंच, बड़े नाम और बड़ी घोषणाएँ नहीं चाहिएं; समाज को संवाद, सम्मान, अपनापन और विश्वास चाहिए।
जनता को सुनिए। युवाओं को जिम्मेदारी दीजिए। महिलाओं को बराबर सम्मान दीजिए। संतों की वाणी को मंच का केंद्र बनाइए और गुरु जम्भेश्वर भगवान के 29 नियमों को घर-घर पहुँचाइए।
अगले स्थापना दिवस पर केवल मंच बड़ा न हो—समाज का मन भी बड़ा हो।
सिर्फ दूर से दोस्ती न हो—दिलों की दूरी भी समाप्त हो।
सवाल हम सबके सामने है—क्या हम सचमुच एक हैं, या अभी भी केवल दूर से दोस्ती निभा रहे हैं?
अनिल भाम्भू,
मंगाली–हिसार
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