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नाते भूला मूल न खोजो ; सीँचो कांय कमूलू ‘ ?
विसन विसन भंणि अजर जरीलौ ; औ जीवंण का मूलू ‘ ।
शब्दार्थ : –
हे लोगो ! तुम तो पेड के पतोँ मेँ ही भूले हुए हो , ( उसके ) मूल की खोज नहीँ करते ।
( बाह्रा और निस्सार दिखावे मेँ ही भूले-भटक रहे हो , सार वस्तु की ओर तुम्हारा ध्यान ही नहीँ जाता ) । फिर यदि मूल-सिचन की ओर ध्यान भी जाए , तो ‘ सुमूल ‘ सीँचनी चाहिए , कुमूल को क्योँ सीच रहे हो ?
( इससे तो कुफल या विष फल )
की ही प्राप्ति होगी ।
( अब बताते हैँ कि जीवन का मूल क्या है ? ) ।
” विष्णु-विष्णु ” जप करना तथा काम क्रोधादि को बस मेँ करना जीवन का मूल कर्तव्य हैँ ।
क्योँकि इससे जीवनमुक्ति प्राप्त होती है ~
जय श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की
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