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ओ३म् दोय मन दोय दिल सिवी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथा। दोय मन दोय दिल कही न कथा, दोय मन दोय दिल सुणी न कथा।
संकल्प विकल्पात्मक मनः, मन का स्वभाव, संकल्प तथा विकल्प करना है। जब तक मन एक विषय पर स्थिर नहीं होगा तब तक कोई भी कार्य ठीक से नहीं हो सकेगा तथा इसके साथ साथ दिल अर्थात् हृदय में जब तक कोई बात स्वीकार नहीं होगी तब तक वह कभी भी कुशलता से परिपूर्ण नहीं हो सकता। इस बात को लोहापांगल के प्रति बतला रहे हैं। दोय मन तथा दोय दिल से किया हुआ कार्य गुदड़ी की सिलाई का कार्य भी ठीक प्रकार से नहीं हो सकता। उसी प्रकार से द्विविधा वृति से अचेतनावस्था में तो मार्ग भी पथिक भूल जाता है तथा दोय मन तथा दोय दिल से कथाकार कथा भी नहीं कह सकता और न ही श्रोता लोग श्रवण कर सकते।
दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला, दोय मन दोय दिल गुरु न चेला। दोय मन दोय दिल बंधी न बेला, दोय मन दोय दिल रब्ब दुहेला।
दोय मन दोय दिल से तो पन्थ भी दुखदायी हो जाता है क्योंकि पन्थ पर चलना चाहता नहीं जबरदस्ती चलाया जा रहा है। गुरु तथा शिष्य की एकता बिना न तो गुरु ज्ञान दे सकता और न ही शिष्य ले ही सकता है। जब एक मन तथा एक दिल होगा तभी प्रेम श्रद्धा का उदय होगा और यही ज्ञान ग्रहण करवाने में हेतु है। एकाग्रता के विना समयानुसार उठना, बैठना, चलना, कार्य विशेष करना भी नहीं हो सकेगा अर्थात नियमित जीवन नहीं जी सकेगा। दुविधा वृति से तो परमात्मा का स्मरण भी नहीं हो सकेगा।यदि हठात् माला लेकर बैठ भी जायेंगे तो आनन्द दाता परमात्मा का स्मरण नहीं होगा किन्तु दुखदायी हो जायेगा।
दोय मन दोय दिल सूई न धागा, दोय मन दोय दिल भिड़े न भागा। दोय मन दोय दिल भेव न भेऊं, दोय मन दोय दिल टेव न टेऊं।
मन तथा दिल इन दोनों की एकता-शांति बिना तो सूई में धागा भी नहीं पिरोया जा सकता तथा योद्धा लोग भी युद्ध के मैदान में पहुंच जाते हैं परन्तु जब तक घर, स्त्री , परिवार की मोह माया में वृति लगी है तब तक न तो वे ठीक प्रकार से युद्ध कर सकते और न ही भाग सकते। बीचो बीच में पड़कर जीवन को नष्ट कर लेते हैं। एकाग्र वृति के विना तो किसी प्रकार का रहस्य भी नहीं जाना जा सकता और न ही व्यवहार में किसी के मन की बात उसका भेद विचार जाना जा सकता तथा उसी प्रकार से ही द्विधा वृति यानि द्वेष भाव से न तो आप किसी की प्रेम भाव से सेवा कर सकते और न ही किसी से करवा सकते।
रावल जोगी तां तां फिरियो, अण चीन्हैं के चाह्यो। कांहै काजै दिसावर खेलो, मन हठ सीख न कायों।
हे जोगियों के रावल! तुम लोग कहां कहां भटके हो तथा क्यों भटके हो, क्या चाहते हो , यदि कुछ बिना साधना स्मरण जप तप के ही केवल निरंतर भ्रमण द्वारा ही सभी कुछ चाहते हो तो यह तुम्हारी बड़ी भूल होगी। किसलिये दिशावरों में जाकर पाखण्ड का खेल रचते हो? यह शरीर यात्रा तो बिना पाखण्ड के ही चलती रहेगी। तुम्हें भ्रमण काल में भी किसी गुणी सतगुरु के पास बैठकर सीख पूछनी चाहिये थी किन्तु तुमने मन के हठिले स्वभाव के कारण कभी भी किसी से भी अच्छी सीख नही पूछी तो फिर भटकना व्यर्थ ही सिद्ध हुआ।
थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, गुरु न चीन्हों रायों। कण विन कूकस कांये पीसों, निश्चय सरी न कायों।
न तो आप लोग योग को पूर्णतया सिद्ध करके योगी बन सके और न ही पूर्णतया भोग सके तथा गुरु की शरण ग्रहण करके परमात्मा विष्णु का स्मरण एवं भक्ति भी नहीं कर सके तो तुम्हारा यह अमूल्य जीवन कण-धान से रहित कूकस को ही पीसता है। उस भूसे से ही धान निकालता रहा, ऐसा क्यों किया? निश्चित ही तुम्हारा कार्य सिद्ध नहीं होगा। अर्थात् न तो तुम भूसे के अन्दर से धान निकाल सके और न ही इस साधन रहित भ्रमण शील जीवन से कण तत्व की प्राप्ति हो सकेगी।
बिण पायचियें पग दुख पावै, अबधूं लोहै दुखी सकायों। पार ब्रह्म की सुद्ध न जांणी, तो नागे जोग न पायो।
हे अवधूं! तुमने पावों में जूते नहीं पहन रखे हैं, इनके बिना तुम्हारे पैर दुख पा रहे हैं। यही इस मिथ्या त्याग का फल है और तुम्हारा लोहे से निर्मित कच्छ भी कम दुखदायी नहीं है। फिर अपने को सिद्ध किस आधार पर कहते हो। योगी या सिद्ध भी क्या कभी दुख का अनुभव करता है ? जब तक परब्रह्म परमात्मा की सुधी निरंतर नहीं रहेगी तब तक नंगे रहने से कोई योगी नहीं बन जाता है।
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