Sanjeev Moga

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सबद-23 ओ३म् साल्हिया हुवा मरण भय भागा, गाफिल मरणै घणा डरै

‘प्रसंग-8 दोहा’ विष्णु भक्त गुंणावती, रहे जूं तेली जात। विश्नोई धर्म आचरै, जम्भेश्वर किया पात। एक मृघा और तेल पे, आठ सै एक हजार। खड़े सकल वानै चढ़ै, वह्या करारी धार। थलसिर हरखे देवजी, साथरियां बूझे बात। भाग खुलै किस जीव के, कहिये दीना नाथ। गुणावती नगरी निवासी तेली जाति के कुछ व्यक्ति थे। वे तिलों से तेल निकालने का कार्य करने वाले तथा भगवान विष्णु के उपासक थे। उन्हें सुजीव समझकर श्री देवजी ने पाहल देकर पवित्र किया और…

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सबद-24 ओ३म् आसण बैसण कूड़ कपटण, कोई कोई चीन्हत वोजूं वाटे। वोजूं वाटै जे नर भया, काची काया छोड़ कैलाशै गया।

: प्रसंग-9 दोहा : विश्नोवण एक आय कह्यो, आयस तणों विचार। ढ़ोसी की पहाड़ी हिलावै, ताका कहो आचार। सम्भराथल पर एक बिश्नोई स्त्री ने आकर जम्भदेवजी से कहा-कि यहां ढ़ोसी नाम की पहाड़ी पर एक योगी बैठा हुआ है। वह कभी कभी ऐसा लगता है कि पहाड़ी को हिला देता है इसमें सच्चाई या झूठ का कुछ पता नहीं है और यह भी मालूम नहीं है कि उसमें सिद्धि है या पाखण्ड? इसका निराकरण कीजिये। इस शंका के निवारणार्थ यह…

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शब्द -25 ओ३म् राज न भूलीलो राजेन्द्र, दुनी न बंधै मेरूं। पवणा झोलै बिखर जैला, धुंवर तणा जै लोरूं।

ओ३म् राज न भूलीलो राजेन्द्र, दुनी न बंधै मेरूं। पवणा झोलै बिखर जैला, धुंवर तणा जै लोरूं। भावार्थ- हे राजेन्द्र!इस राज्य की चकाचौंध में अपने को मत भूल। अपने स्वरूप की विस्मृति तुझे बहुत ही धोखा देगी तथा दुनिया मेरी है इस प्रकार से दुनिया में मेरपने में बंधना नहीं है। यदि इस समय तुम स्वयं बंधन में आ गये तो फिर छूटने का कोई उपाय नहीं है। यह संसार तो जिसे तुम अपना कहते हो यह धुएं के थोथे…

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सबद-26 ओ३म् घण तण जीम्या को गुण नांही, मल भरिया भण्डारूं। आगे पीछे माटी झूलै, भूला बहैज भारूं।

ओ३म् घण तण जीम्या को गुण नांही, मल भरिया भण्डारूं। आगे पीछे माटी झूलै, भूला बहैज भारूं। भावार्थ- यह जमात का महंत अध्धिक भोजन खाने से मोटा-स्थूल हो गया है। किन्तु अधिक खाकर मोटा होने में कोई गुण नहीं है। यह शरीर रूपी भण्डार मल से ही तो भरा हुआ है। इसके आगे और पीछे चर्बी रूपी माटी ही तो झूल रही है। यह बेचारा अपनी भूल के कारण ही तो भार उठाकर घूम रहा है। बिना परिश्रम के स्वाद…

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सबद-27 ओ३म् पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं, पढ़ सुन रहिया कछू न लहिया। नुगरा उमग्या काठ पखाणों,कागल पोथा ना कुछ थोथा,ना कुछ गाया गीयूं |

ओ३म् पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं, पढ़ सुन रहिया कछू न लहिया। नुगरा उमग्या काठ पखाणों,कागल पोथा ना कुछ थोथा,ना कुछ गाया गीयूं | भावार्थ- कागज द्वारा निर्मित वेद, शास्त्र और संत-महापुरूषों के शब्दों को आप लोगों ने पढ़ा है तथा प्रतिदिन पढ़ते भी आ रहे हैं तथा कुछ लोग सुनते भी हैं। किन्तु जब तक पढ़ सुनकर भी कुछ प्राप्ति नहीं करोगे तो कुछ भी लाभ नहीं है। जैसे अनपढ़ अज्ञानी थे वैसे ही पढ़-सुनकर रह गये तथा कुछ…

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शब्द नंबर 28 मच्छी मच्छ फिरै जल भीतर

मच्छी मच्छ फिरै जल भीतर शेख मनोहर ने जाम्भोजी से पूछा कि -आप मुरीद,पीर,गुरु और देव इनमें से क्या है?क्या आत्मा को जीव कहना अनुचित है? शेख की जिज्ञासा जान गुरु महाराज ने उसे यह शब्द कहा:- ओउम मच्छी मच्छ फ़िरै जल भीतर तिहि का मांघ न जोयबा हे शेख!मछलियाँ मगरमच्छ पानी में तैरते रहते हैं,परंतु उनके विचरण करने का कोई तय रास्ता नहीं होता। वे सब कहीं इधर-उधर घूमते रहते हैं। परमतत्व है ऐसा आछे उरबार न ताछै पारू…

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सबद-29 (इलोल सागर) ओ३म् गुरु के शब्द असंख्य प्रबोधी, खार समंद परीलो। खार समंद परै परै रे, चैखण्ड खारूं, पहला अन्त न पारूं। 

ओ३म् गुरु के शब्द असंख्य प्रबोधी, खार समंद परीलो। खार समंद परै परै रे, चैखण्ड खारूं, पहला अन्त न पारूं।  भावार्थ-‘‘स तु सर्वेषां गुरु कालेनानवच्छेदात्‘‘ ‘योग दर्शन‘ वह परम पिता परमात्मा ही सभी का गुरु है तथा काल से परे है। ऐसे सतगुरु के शब्द व्यर्थ नहीं हुआ करते, वे तो असंख्य जनों को प्रबोध-ज्ञान कराने वाले होते हैं। गुरु जाम्भोजी कहते हैं कि इन मेरे शब्दों ने असंख्य जनों को ज्ञानी बनाया है। इस जम्बू दीप भारत खण्ड से…

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सबद-30 (कूंचीवाला) ओ३म् आयो हंकारो जीवड़ो बुलायो, कह जीवड़ा के करण कमायो। थर हर कंपै जीवड़ो डोलै, उत माई पीव न कोई बोलै।

ओ३म् आयो हंकारो जीवड़ो बुलायो, कह जीवड़ा के करण कमायो। थर हर कंपै जीवड़ो डोलै, उत माई पीव न कोई बोलै। भावार्थ-मृत्युकाल रूपी हंकारो जब आता है तो इस जीव को शरीर से बाहर बुला लेता है। आगे स्वर्ग या नरक रूपी न्यायालय में पेश किया जाता है, वहां पर न्यायाधीश यमराज या धर्मराज उसे पूछते हैं कि जीवड़ा तूं सच्ची बात बतला दे कि संसार में रहकर तुमने क्या कर्म किये? वैसे तो कर्मों की सूचि पहले ही उनके…

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