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सबद-52 ओ३म् मोह मण्डप थाप थापले, राख राखले, अधरा धरूं। आदेश वेसूं ते नरेसूं, ते नरा अपरंपारूं।

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दोहा

जोगी इस विधि समझिया, आया सतगुरु भाय। देव तुम्हारे रिप कहो, म्हानै द्यो फुरमाय। सतगुरु कहै विचार, तुम्हारा तुम पालों। जोगी कहै इण भाय, नहीं दुसमण को टालों। देव कहै खट् उरमी, थारे दुसमण जोर। भूख तिस निद्रा घणी, तुम जांणों कई और। तुम्हारा तुम पालो सही, हमारा हम पालेस। सतगुरु शब्द उचारियो, जोग्या कियो आदेष।

उपर्युक्त सबदों की बात योगियों के कुछ समझ में आयी,  सभी ने प्रेम पूर्वक भोजन किया सतगुरु सभी को अच्छे भी लगे। भोजन के बाद में लक्ष्मणनाथ ने कहा कि हे देव! यदि आपके कोई शत्रु है तो आप हमें बतला दीजिये। हम उनको नष्ट करके आपको निर्भय कर देंगे। तब श्री देवजी ने कहा कि हमारे यहां तो कोई दुश्मन नहीं है। किन्तु तुम्हारे ये जन्म मरण क्षुध्धा तृषा हर्ष शोक षट् उर्मिया जबरदस्त दुश्मन है। आप इनकों रोकिये मेरी चिंता न कीजिऐ। ऐसा कहते हुऐ शब्द उच्चारण किया।

 

सबद ओ३म् मोह मण्डप थाप थापले, राख राखले, अधरा धरूं। आदेश वेसूं ते नरेसूं, ते नरा अपरंपारूं।

भावार्थ- इस विशाल संसार में मनुष्य अपना मोह जाल फैलाता है यही कहता है कि यह मेरा है और यह पराया है जो मेरा है उससे मोह हो जाता है वह मुझे प्राप्त हो मेरे पास रहे। एक वस्तु प्राप्त हो जाती है तो दूसरी पर दृष्टि दौड़ाता है सभी वस्तुएँ तो प्राप्त होनी असंभव है तो फिर दुखी हो जाता है। जम्भदेवजी कहते हैं कि इस मोह-माया के फैलाव को समेट कर मण्डप बना लें। एक जगह परमात्मा में ही मोह को एकत्रित कर लें। वही तुम्हारे लिये भवन बन जायेगा। जो तुम्हें सहारा भी देगा। उसी दिव्य मोह निर्मित भवन के नीचे इन पांच ज्ञानेन्द्रियों सहित मन को स्थिर करो। जब तुम्हारा मोह परमात्मा विषयक हो जायेगा तो वह प्रेम में परिवर्तित हो जायेगा। उसी प्रेम में यह मन भी लीन होकर स्थिर हो जायेगा। जब मोह का विस्तार समाप्त हो जायेगा तो फिर मन बेचारा कहां जायेगा इसे भी परमात्मा की छत्र छाया में विश्राम मिलने लग जायेगा। वह चंचल मन अधर होते हुऐ भी धैर्यवान शांत हो जायेगा। फिर वह इन्द्रियों सहित आपके आदेशानुसार चलेगा , बैठेगा, शांत रहेगा। वही नर स्वकीय इन्द्रियों का और मन का राजा है तथा वही नर श्रेष्ठ है। जिसकी महिमा का कोई आर-पार नहीं है। वही व्यक्ति पूजनीय होता हुआ जीवन को सफल बना लेता है

रण मध्ये से नर रहियों, ते नरा अडरा डरूं। ज्ञान खड़गूं जथा हाथे, कौण होयसी हमारा रिपूं|

मोह को जीत करके उसे जो सदुपयोग में लगा दे अर्थात् परमात्मा के प्रेम रूपी मण्डप में परिवर्तित कर दे, ऐसा नर ही संसार रूपी युद्ध के मैदान में संघर्ष करता हुआ भी उससे बाहर हो जाता है। यह संसार दुख तो मोह लिप्त प्राणी के लिये ही है निर्मोही जन तो संसार में जीवन यापन करता हुआ भी दुखों से दूर रहता है। ऐसे जन न तो कभी किसी से डरते हैं और न ही किसी को डराते हैं। इसलिये हे लक्ष्मणनाथ ! मैने तो इस प्रकार के दिव्य-अलौकिक ज्ञान रूपी खड़ग हाथ में ले ली है। यह खड़ग हाथ में रहते हुऐ हमारा शत्रु कौन हो सकता है। आप भी इन लोहे के अस्त्र-शस्त्र को छोड़कर यह ज्ञान रूपी तलवार ही धारण कीजिये। आपके सभी शत्रु स्वतः ही नष्ट हो जायेंगे।

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Sanjeev Moga
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