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सबद-12 : ओ३म् महमद महमद न कर काजी, महमद का तो विषम विचारूं।

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‘दोहा‘‘
‘फिर यो काजी बोलियो, फरमाई यह मुहमद। जम्भगुरु तब यों कही, इसका सुणियो सबद।’ 
फिर वह काजी कहने लगा-हे देव! यह जीव हत्या करना तो मुहमद साहब ने हम लोगों को बतलाया है, , तब जम्भेश्वर जी ने सबद उच्चारण किया।

:: सबद-12 ::
ओ३म् महमद महमद न कर काजी, महमद का तो विषम विचारूं।
भावार्थ- अपने कुकर्मों पर परदा डालने के लिये हे काजी! तूं मुहमद का नाम बार-बार मत ले। तुम्हारे विचारों,कर्तव्यों से मुहम्मद का कोई मेल जोल नहीं है। उनके विचार सर्वथा भिन्न थे।

महमंद हाथ करद जो होती, लोहै घड़ी न सारूं।
यदि तुम्हारी यह मान्यता है कि मुहमद भी हाथ में करद रखते थे तो यह बात सर्वथा गलत है क्योंकि प्रथम तो मुहमद जैसे महापुरूष हाथ में कभी हिंसा करने वाली खड़ग रख ही नहीं सकते और यदि रखते थे तो उनके पास में लोहे की बनी हुई नहीं थी। वह तो ज्ञान रूपी खड़ग ही थी। जिससे लोगों के पाप नाश किया करते थे।

महमद साथ पयंबर सीधा, एक लख असी हजारूं।
मुहमद के साथ में तो एक लाख असी हजार पैगम्बर यानि सिद्ध पुरूष थे। उन्होंने तो सद्मार्ग अपना करके स्वयं का तथा साथ में इन सिद्ध पुरूषों का भी उद्धार किया था।

महमद मरद हलाली होता, तुम ही भये मुरदारूं।
मुहमद तो पूर्णतया हक्क से कमाई करके शाकाहारी भोजन करते थे और तुम लोग जो अपने को उनका शिष्य बतलाकर मुर्दा खाते हो अर्थात् मांसाहारी होकर उनके मार्ग के अनुयायी कदापि नहीं हो सकते।

इस प्रकार से पुरोहित और काजी दोनों ने अलग-अलग शब्द सुनकर वापिस यथा स्थान पहुंचकर लूणकरण और मुहमद को अवगत करवाया।
साभार – जंभसागर

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Sanjeev Moga
Sanjeev Moga
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