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*मूंड मुंडायो,मन न मुंडायो*
समराथल धोरे पर संत मंडली के साथ बैठे एक सन्यासी ने गुरु जंभेश्वर महाराज से कहा कि उसने अपनी दाढ़ी मूंछ एवं सिर मुंडवा लिया है। सिर मुंडाने के बाद हर व्यक्ति योगी हो जाता है,तब उसे और क्या कुछ करने की आवश्यकता रह गई है? सन्यासी की बात सुन, गुरु महाराज ने यह शब्द कहा:-
*मूंड मुंडायौ मन न मुंडायो मोह अबखल दिल लोभी*
हे साधु ! तुमने मूँड तो मुँडाया परन्तु अपने मन को नहीं मुँडाया। जब तक तुम्हारे मन पर कामवासनाओं एवं कुप्रवृत्तियों का मैल चढ़ा हुआ है।तब तक यह सिर मुंडा कर सन्यासी बनने का ढोंग व्यर्थ है।जब तक तुम्हारे हृदय में लोभ-लालच भरा हुआ है और मुँह से आल-बाल-अणछाणी वाणी बोलते हो, तब तक तुम्हारे अंतःकरण में सन्यास घटित नहीं हो सकता।
*अन्दर दया नहीं सुरकाने निंदरा हडै़* *कसोभी*
न तो तुम्हारे ह्रदय में प्राणी मात्र के प्रति दया भाव है,न तुम कभी देववाणी का पाठ अपने कानों से सुनते हो, दूसरों की निंदा और कुशोभा सुनने को तुम्हारे कान लालायित रहते हैं।
*गुरू गति छुटी टोट पड़ेला उनकी* *आवा एक पख सातो वै* *करणी हुंता खूंधा*
गुरु द्वारा बताए मार्ग पर चलने से तुम नित्य घाटे में रहोगे।इस से तुम्हारा बहुत बड़ा अहित होगा। ऐसे गुरु आज्ञा से विपरीत चलने वाले जीवों की आयु 7 दिन या 1 पखवाड़े भर की होती है। वे अल्पायु जीव,बार-बार जन्मते और बार-बार मरते रहते हैं।
*असी सहंस नव लाख भवैला* *कुंभी दौरे ऊंधा*
ऐसे कुजीव अपने ही कुकर्मों से बार-बार मृत्यु के द्वारा नष्ट किए जाते रहते हैं और ऐसा जीव नौलाख अस्सी हजार पलों तक यानि 6 माह 2 दिन 13 घड़ी और 20 पल गर्भ रूपी कुम्भीपाक नर्क में उल्टा लटका रहता है और जल्दी जल्दी मरने के कारण यह गर्भावस्था का कुम्भीपाक नर्क उसे बार-बार भोगना पड़ता है।
क्षमा सहित निवण प्रणाम
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*जाम्भाणी शब्दार्थ*
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