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शब्द 81

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*भल पाखंडी पाखंड मंडा*
एक दूर देश का रहने वाला साधु,जाम्भोजी की महिमा सुन बीकानेर राज्य का ठिकाना पूछता हुआ,पीपासर के पास धुंपालिये गाँव पहुँचा।जब उक्त साधु ने उस गाँव में जाम्भोजी का पता ठिकाना पूछा, तो एक महिला ने बताया कि वे कोई देव पुरुष नहीं है, बल्कि एक पाखंडी है।महिला की बात सुन वह दूर देश का वासी बड़ा दुखी हुआ।उस साधु की ह्रदय पीड़ा जान गुरु महाराज ने अपना आदमी भेज, उसे समराथल पर बुलाया और उसे यह शब्द कहा:-
*भल पाखण्डी पाखण्ड मंडा पहला पाप पराछत खंडा*

हे भोले भक्त!हम पाखंडी तो हैं, परंतु कोई छोटे-मोटे साधारण पाखंडी नहीं,बहुत बड़े पाखंडी हैं। हम साक्षात ब्रह्मा होते हुए भी मानव देह धारण कर एक बहुत बड़ा नाटक खेल रहे हैं।हमने यह प्रपंच विश्वकल्याण की भावना से रचा है। इस में हम किसी को कोई धोखा नहीं देते, बल्कि जो हमारी शरण में आता है, हम उस के समस्त संचित पापों का प्रायश्चित करवा कर, उन्हें नष्ट कर देते हैं।

*जा पाखण्डी कै नादे वेदे शीले सबदे बाजत पौण*

हम वह अभिनेता हैं,जिसकी साँस साँस के साथ उच्चरित ध्वनि में वेदों का सार समाहित है। हम समस्त प्राण वायु को नियंत्रित कर निरंतर अनहद नाद की ध्वनि सुनते रहते हैं।

*तां पाखण्डी नै चीन्हत कौण जांकी* *सहजै चूके आवागौण*

यदि कोई हमारे इस मूल स्वरूप को पहचान ले,तो वह इस संसार में बार-बार जन्म मरण के चक्कर से सहज ही मुक्त हो जाता है। अर्थात हम ऐसे पाखंडी हैं, जो भक्तों को उनके पूर्व पापों से छुड़ाते हैं और इस जन्म मरण के चक्कर से हमेशा के लिए मुक्त कर देते हैं।

क्षमा सहित निवण प्रणाम
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*जाम्भाणी शब्दार्थ*

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Sanjeev Moga
Sanjeev Moga
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