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शब्द 57

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*अति बलदानों सब स्नानो*
सैंसे भगत के पुत्र ने गुरु जंभेश्वर महाराज से अति विनम्रता के साथ दास्य भाव की भक्ति के अनुरूप प्रार्थना की कि गुरु महाराज पतित पावन है, सबके स्वामी है तथा वह स्वय अति मंदबुद्धि पापियों में सिर मोर तथा स्वर्ग प्राप्ति के रास्ते से विमुख चलने वाला है।अतः गुरु महाराज कृपा कर उसका उद्धार करें।सैंसे पुत्र की प्रार्थना सुन गुरु महाराज ने जमाती लोगों के सम्मुख उसे यह शब्द कहा:-
*अति बल दानों सब स्नानो गऊ कोट जे तीरथ दानों बहुत करे अचारु*

हे भक्तजनों !जिन्होंने अपनी सामर्थ्य से भी अधिक बलिदान दिया, सब तीर्थों में जाकर स्नान किया, करोड़ों गायों का,तीर्थ स्थलों पर दान दिया तथा और भी अनेक प्रकार के क्रिया कर्म एवं धार्मिक आचरण किए।

*तेपण जोय जोय पार न पायो भाग परापति सारू*

परंतु देखा गया है कि ऐसे लोग भी जन्म मरण के संसार चक्र से पार नहीं पहुँचे।साधना तो बहुत करते हैं, परंतु उसका फल किसी भाग्यवान को ही अपने शुभ कर्मों के अनुसार प्राप्त होता है।

*घट ऊधें बरषत बहु मेहा नीर थयो पण ठालू*

जैसे चाहे जितनी घनघोर घटाएं बरसे, समस्त ताल-तलैया भर जाएँ , परंतु एक घड़ा जो ऊँधा रखा पड़ा है,वह खाली का खाली ही रहेगा। अपार जल के होते हुए भी वह घट जैसे खाली रहता है, ऐसे ही परमात्मा की अपार-कृपा के बावजूद कुछ लोग जो परमात्मा मुखी नहीं होते। जो अपने अहम को नहीं छोड़ पाते,वे परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकते।ईश्वर प्राप्ति में अहंकार बहुत बड़ी बाधा है।

*को हायसी राजा दुर्योधन सो विसन सभा महिं लाणों तिण ही तो जोय जोय पार न पायो अध बिच रहियो ठालुं*

जैसे राजा दुर्योधन कृष्ण की सभा में रहकर,साक्षात् भगवान से मिलकर भी अपना उद्धार नहीं कर सका। उसी प्रकार और भी बहुत से अंहकारी लोग हैं,जो अपने अहम भाव के कारण भगवान का साथ पाकर भी मोक्ष को प्राप्त नहीं हो सकते।दुर्योधन कृष्ण की महिमा को जानकर भी, उनके साथ रहकर भी,अज्ञानी का अज्ञानी ही बना रहा।कुछ भी प्राप्त नहीं कर सका ।

**जपिया तपिया पोह बिन खपिया खप खप गया इंवाणी*

परमात्मा प्राप्ति का सच्चा रास्ता ज्ञान न होने के कारण,अनेकों साधक,जाप तपते हुए,तपस्या करते हुए,अपने जीवन को व्यर्थ में ही खो बैठे।उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ।वे खाली के खाली ही रहे।

*काचा कुंभ गलै गल जायसै रहयो न रहसी पांणी*

शरीर मिट्टी के कच्चे घडे की भान्ति हैं जो नष्ट हो ही जाऐगा घडा फूट जाने पर उसमें पानी नहीं रह सकता वैसे ही काया में जीव न कभी स्थिर रहा हैं और न ही रहेगा।

*जतिया सतिया पीर रिषेसर पीर मसायक जांणी*

यह समझना चाहिये कि मृत्योपरान्त जती है सत्यवादी पीर ऋषीवर आदि कोई भी जीव मोक्ष प्राप्ति में सहायक नहीं हो सकते हैं ।

*तेऊ पार पहुंता नाहीं तांकी धोती रही* *आसमानी*

ऐसे-ऐसे तांत्रिक, तथाकथित सिद्ध लोग भी जिनकी धोतियाँ तंत्र बल से आसमान में अधर रह कर सूखा करती थी, वे भी संसार सागर से पार नहीं पहुँच सके। अर्थात सद्गुरु की कृपा और अपने शुभ कर्मों द्वारा निर्मित भाग्य से ही कोई भक्त,अहम भाव को त्यागकर, मुक्ति का सच्चा रास्ता पा सकता है।

क्षमा सहित निवण प्रणाम
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*जाम्भाणी शब्दार्थ व जम्भवाणी टिका*

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Sanjeev Moga
Sanjeev Moga
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