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शब्द नं 110

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मथुरा नगर की रानी होती
जिस समय फलोदी के पास जाम्भोलाव तालाब का खनन हो रहा था,उस समय जमातीजनों ने एक गधी को दिखाकर गुरु जंभेश्वर महाराज से जानना चाहा कि इसने पूर्व जन्म में ऐसे क्या पाप कर्म किए थे कि इस जन्म में इसे गधी का जन्म मिला और इसके पीठ पर घाव है। उससे मवाद, खून बहता रहता है। दिन भर यह इसी घाव वाली पीठ पर ढाँची द्वारा पानी ढो रही है। पिठ से ढाँची अलग रखते ही कौवे चोंचों से इसके घांव पर चोट करते रहते हैं। इसकी इस दुर्दशा को देखकर हमें बड़ी पीड़ा होती है। जमातीजनों की जिज्ञासा जान गुरु महाराज ने यह शब्द कहा:-
मुथर नगर की राणी हुंती हुंती पाटमदे राणी तिरथवासी जांता लूटया।अति लूटया खुरसाणी।मांणक मोती हीरा लूटया। जाय बिलुधा डांणी

हे जिज्ञासुओ!यह गधी भी अपने पूर्व जन्म में मथुरा नगर की पाटवी महारानी थी। उस समय एक बार इसके राज्य की सीमा में से बहुत से यात्री तीर्थ वास करने के लिए जा रहे थे।महारानी के आदेश से राज्य के कर अधिकारियों ने कर वसूल के नाम पर उन तीर्थ यात्रियों से उनके खुरसाणी घोड़े ,माणक, मोती,हीरे जवाहरात आदि सब कुछ लूट लिया। रानी का कार्य किसी को लूटना नहीं, बल्कि लूट से बचाना और लटेरों को दंड देना होता है।

कवले चुके वचने हारी जिहिं औंगण ढांची ढोवे पांणी

इसने रानी बनते समय भगवान को साक्षी मान कर सबके जान-माल की रक्षा करने का कवल किया था। तीर्थ यात्रियों को लूट कर यह अपने कवल से चुक गई।अपने ही द्वारा दिये हुए वचनों को हार गई।अपने किए हुए कवल से चूकना और दिये हुए वचनों को हारना,यही इसका सबसे बड़ा अवगुण था और उसी अवगुण एवं अपराध के कारण यह इस जन्म में गधी बनकर अपनी इस घांव-भरी पीठ पर ढाँची में पानी के घड़े रखकर ढो रही है।

विष्णु ने दोष किसो रे प्राणी आपे खता कंमाणी

इस जन्म में यह जो पीड़ाएँ भोग रही है, इसमें भगवान विष्णु या विधाता का कोई दोष नहीं है ।यह अपने ही द्वारा किए हुए अपराधों का दंड भोग रही है।अपने किए का फल सब को भोगना पड़ता है।
क्षमा सहित निवण प्रणाम
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जाम्भाणी शब्दार्थ

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Sanjeev Moga
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