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उदार हृदय के राजनेता थे चौधरी भजनलाल जी (Part 2)

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जम्भेश्वर महाराज से प्रार्थना की और गुरु कृपा से ही चौधरी भजनलाल औरैया के उस बिश्नोई सम्मेलन के मात्र 25 दिनों बाद ही हरियाणा के मुख्यमंत्री बन गये। उन दिनों जुलाई, 1981 में मैंने हिसार में वकालत शुरू कर दी और चौधरी भजनलाल जी के मैं राजनैतिक रूप से और अधिक निकट आता चला गया। सन् 1982 में मुझे चौधरी भजनलाल जी ने ही बिश्नोई समाज की सुप्रसिद्ध पत्रिका अमर ज्योतिका सम्पादक नियुक्त करवाया, क्योंकि तब तक मैं वकील के साथ-साथ एक युवा पत्रकार के रूप में भी हिसार में स्थापित हो चुका था। बिश्नोई मन्दिर, हिसार में गुरु जम्भेश्वर महाराज के जन्मोत्सवजन्माष्टमीसमारोह के मंच संचालन से लेकर मुकाम में अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा द्वारा आयोजित फाल्गुन एवं आसोज मेलों के अवसर पर खुले अधिवेशनों में भी मंच संचालन का दायित्व मुझे सौंपा जाता था तथा सामाजिक तौर पर भी मैंने भारत के हर राज्य में चौधरी भजनलाल जी के कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर उनके साथ भाग लिया।
मैं 24 जून, 1991 से 10 मई, 1996 तक चौधरी भजनलालजी के तीसरे मुख्यमंत्रीत्व काल में सरकारी तौर पर उनका पी.आर.ओ. भी रहा। उन5 वर्षों में उनके साथ पूरे देश में मुझे जाने का अवसर मिला। अप्रैल, 1992 में तिरुपति जी में हुए कांग्रेस के महा अधिवेशन में मैं 5 दिन चौधरी भजनलाल जी के साथ था। उस समय दक्षिण भारत में मैंने चौधरी भजनलाल जी की जो लोकप्रियता देखी, उससे उनके बहुत उच्चकोटि के राष्ट्रीय नेता होने का मुझे अहसास हुआ। वे दक्षिण भारत के लोगों में भी उतने ही लोकप्रिय थे जितने कि वे उत्तर भारत के लोगों के दिलों में बसते थे।
चौधरी भजनलाल राजनेता होते हुए भी एक संत प्रवृत्ति के उदार हृदय वाले इंसान थे। इंसानियत उनमें क्ट-क्ट कर भरी हुई थी। उनमें अपने बड़े से बड़े राजनैतिक शत्रु को भी माफ करने की क्षमता थी, जो केवल संत प्रवृत्ति के लोगों में ही पाई जाती है। वे गरीबों के दु:ख दर्द को महसूस करने वाले उनके सच्चे हमदर्द थे। वे जीवनभर आत्मश्लाघा से दूर रहे। सन् 1992 में जब वे हरियाणा के मुख्यमंत्री थे, तो देश के बड़े-बड़े प्रकाशक चौधरी भजनलाल जी की जीवनी प्रकाशित करना चाहते थे। परन्तु इस बारे में चौधरी भजनलाल जी की सोच बहुत ऊंची थी। वे कहते थे कि जीवनी तो इंसान के स्वर्गवासी होने के बाद बनती है। जब हम भलाई के अच्छे काम करेंगे तो जीवनी तो बाद में लोग अपने आप लिखते रहेंगे। उन्होंने जीते जी कभी अपनी जीवनी प्रकाशित नहीं करवायी।
चौधरी भजनलाल जी के साथ लम्बी यात्राएं करने का मेरा सिलसिला अक्टूबर, 1978 से प्रारंभ होकर 30 अक्टूबर, 2010 तक चला। 29 अक्टूबर, 2010 को मुझे उनके साथ हिसार से मुक्तिधाम मुकाम अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के तीन दिवसीय महाधिवेशन में भाग लेने हेतु जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ और लगातार 5 घंटे हम इस यात्रा के दौरान विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श करते रहे। 30 अक्टूबर, 2010 को मुक्तिधाम मुकाम में महाधिवेशन के समापन समारोह के पश्चात मुझे चौधरी भजनलाल जी के साथ की गई मुक्तिधाम मुकाम से हिसार तक ही यात्रा अविस्मरणीय रहेगी, क्योंकि उन जैसे राष्ट्रीय नेता एवं युगपुरुष के साथ वह मेरी अन्तिम लम्बी यात्रा थी। इस यात्रा के 5 घंटों में चौधरी भजनलाल जी निरन्तर मुझसे बिश्नोई समाज के उत्थान कार्यों, पर्यावरण संरक्षण कार्यों तथा गुरु जम्भेश्वर महाराज की जीवनी देश के सभी राज्यों में शिक्षा पाठ्यक्रमों में शामिल करवाने हेतु जोर देते रहे। उनकी इच्छा थी कि पन्द्रहवीं सदी में दिया गया गुरु जम्भेश्वर महाराज का यह संदेश कि जीव दया पालणी, रूख लीली नंहि घावै अर्थात् जीवों पर दया करो और हरे वृक्षों को मत काटी विश्व के कोने-कोने में पहुंचाया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण संरक्षण पर मंडरा रहे खतरों का समाधान निकल सके।
चौधरी भजनलाल हरियाणा की माटी से जुड़े एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने गरीबों के दिलों पर राज किया और हमेशा 36 बिरादरी के लोगों के दु:ख सुख में शामिल होते रहे। इंसानियत का यह पुजारी 3 जून, 2011 को दुनिया को अपना आखरी सलाम कर गया। परन्तु आने वाली पीढ़ियां उन्हें हमेशा उनकी संत प्रवृत्ति के लिए याद रखेगी। ऐसी दिव्य आत्मा को मेरा कोटि-कोटिनमन।

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Sanjeev Moga
Sanjeev Moga
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